Thursday, January 24, 2008

साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी

साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी ये पंक्तियाँ बदलते दौर के साथ साथ और ज्यादा सही लगने लगी हैं हम। हम सभी ज़िंदगी कि इस भागदौड़ में उन सभी बातों को भूलते जा रहे हैं जो हमारी जिन्दगी का अहम हिस्सा हुआ करते थे

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